मिलती है अनुपम शान्ति परम भगवान तुम्हारे दर्शन में
प्रो सी बी श्रीवास्तव
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मिलती है अनुपम शान्ति परम भगवान तुम्हारे दर्शन में
मन हो उठता उद्विग्न कि जीवनरण के संघर्षण में
जीवन है माया जाल अमर जिसने सबको उलझाया है
है कौन यहां जग मे जिसने मनवांछित सब सुख पाया है
मरूथल मे ज्यों मृग तृष्णावश दिखता लहराता सागर है
वैसे ही पग पग मे फैले अनगिन आकर्षण है
मन और व्यथित होता झू्ठी आसक्ति मे और आकर्षण में
डगमग डगमग होती नैया आये दिन झंझावतो मे
पथ नही सूझता आंखो को गहरी अंधियारी रातो में
उठ जाता सब विशवास कि जब श्रम काम न कोई आता है
जीवन धारा को भरमाने आकर्षण और विकर्षण में
मिल पाई न मन को शान्ति कभी जन धन यश के संर्वधन में
तुम सत् चित् आनंद रूप मधुर संरक्षक पथदर्शक दाता
वह ही कुछ पा सकता है प्रभु जो शरण तुम्हारी आ पाता
बगिया मे फूल बहुत है पर कांटो की पहरेदारी में
सौंदर्यँ शक्ति साधन क्षण के पर स्थायी परिवर्तन है
दिखता है उथलापन ही मन का अनुचित आत्म प्रदर्शन मे

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